शनिवार, 25 अगस्त 2012

कौन ? मैं हूँ मौन !

 आदरणीय अन्ना अंकल,
                  आप इन दिनों मौन धारण किए हुए हैं तो बोलेंगे नहीं . चुपचाप बैठे रहने से टाइम पास नहीं होता . ऐसे में आप आज्ञा दें तो एक कहानी सुनाऊं ? .
 अंकल जी, एक बाबा था बहुत ही ज्ञानी-ध्यानी. पूरा गांव उसकी बहुत कद्र करता था क्योंकि वह तन-मन का सच्चा तो था ही, किसी से कुछ मांगने भी नहीं जाता था . गांव वाले अपनी श्रद्धानुसार जो कुछ भी उसे दे जाते, खा लेता और परमात्मा का भजन करता .
      पांच-सात मुस्टण्डों को लगा कि यह तो बड़े मजे का काम है कि दाढी बढाओ और बाबा की शरण चले जाओ. हींग लगे न फिटकरी, रंग भी चोखा आए . बाबा को कंधों पर उठा कर उसकी जय बोलने लगे.
जय बोलने पर हर कोई फिसल जाता है बेचारा भोला बाबा भी फिसल गया . अब ये चेले तसल्ली देने लगे ” अब देखना बाबा. हम गांव में जाया करेंगे और इतनी भिक्षा मांग लायेंगे कि बड़ा सा मंदिर बना देंगे. आप उसमें मज़े से भक्ति करना. आपकी भक्ति हो जाएगी और पूरे गांव के पापियों का कल्याण भी हो जाएगा.“ 
बाबा को उनके रंग-ढंग कुछ ठीक तो नहीं लगे पर उन्हे चेले बना ही चुका तो करता भी क्या, बेचारा. लेकिन, स्याने बाबा ने एक बात जरूर कही ” सब बातें बेशक भूल जाना मगर इतना जरूर याद रखना कि मैं साल में एक दिन शीर्षासन  लगा कर मौन धारण किया करता हूं. उस दिन दुनिया बेशक इधर से उधर हो जाए लेकिन  मैं किसी से कोई बात नहीं करूंगा .“
मुस्टण्डों ने इस बात को एक कान से सुना और दूसरे से निकाल भी दिया और गांव में जा कर धर्म के नाम पर चंदा इकट्ठा करने लगे. गांव ने पूरा सहयोग दिया और बाबा के साथ उनकी जय भी बोली जाने लगी . लेकिन अंकल, स्यानों ने सही कहा है कि पेट और जेब दोनों भर जायें तो उसके बाद हर किसी का काण्ड करने का मन होता है .
बस फिर वही हुआ और उनमें से एक मुस्टण्डे ने गांव में घोषणा कर दी कि मंदिर-वंदिर छोड़ो, इस चंदे से हम दूकान खोलेंगे और दूकान से मुनाफा आएगा उससे मंदिर भी बनवा देंगे . अब तो पूरा गांव क्रोधित हो कर उनके पीछे और मुस्टण्डे बाबा की तरफ भागे जायें . मुस्टण्डे यह सोच कर कि बाबा के कहने से शायद  गांव वाले उनकी बात मान लें . बाबा ने दूर से देखा, माज़रा समझा और चिमटा गाड़ कर शीर्षासन  लगा गया.
अब चेले दूर खड़े-खड़े देखें  कि बाबा बचाएगा लेकिन बाबा तो मौन धारण कर चुका था .
नतीजा यह हुआ कि मुस्टण्डों की गांव वालों ने बहुत भर्तसना की और घोषणा  कर दी कि ये चेले कोई भक्त नहीं बल्कि व्यापारी ही निकले . हां, बाबा जरूर बाबा ही है .
इससे आगे की कहानी तब सुनाऊंगा जब आप फिर कभी मौन धारण करेंगे . बुरा न मानें तो एक बात पूछूं  अंकल जी, उस बाबा का मौन धारण करना तो मुझे समझ आता है लेकिन यह नहीं समझ आता कि आप बार-बार किस बात पर मौन धारण कर जाते हैं ?
अब मौन खत्म करो तो अगली कहानी आप सुनाना, अंकल. हम बच्चों को बड़ों को कहानी सुनाने में उतना मज़ा नहीं आता जितना उनसे सुनने में आता है .
सुनाओगे न अंकल ?
आपका अपना बच्चा,
मन का सच्चा,
अकल का कच्चा
--- प्रदीप नील

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें