शनिवार, 25 अगस्त 2012

दाढ़ी वाली मल्लिका शेरावत

आदरणीय अन्ना अंकल ,
कल राम औतार अखबार ले कर भागा-भागा आया और बोला " मेरी फोटो छपी है, तुमने देखी ?"
मैंने फोटो सुबह ही देख ली थी जिसमें राम औतार गधे पर बैठा था ,गले में जूत्तों की माला और चारों तरफ पुलिस वाले. मुझे तो यह फोटो देखने में ही शरम आ रही थी और इधर यह राम औतार फोटो यूँ दिखा रहा था मानो फोटो ना हो कर  कोई गोल्ड मैडल हो .
मैंने कहा " इस उम्र में तुम्हे यह क्या सूझी राम औतार कि अपनी बेटी की उम्र की लड़की छेड़ दी ?"
राम औतार हंसने लगा " इस अखबार के सम्पादक को नीचा दिखाना था, दिखा दिया ."
मैंने पूछा " उसकी लड़की छेड़ कर ?"
राम औतार फिर हंसा " नहीं यार , उसके अखबार में अपनी फोटो छपवा कर ."
मैं हैरान रह गया , मैंने कहा " फोटो तुम्हारी छपी और नीचा उसने देखा ? मैं कुछ समझा नहीं ."
राम औतार बोला " समझाता हूँ . वैसे तो कहानी बहुत लम्बी है पर सारांश यह कि पिछले महीने मुझे दस लाख रुपयों से भरा एक बैग सडक पर पड़ा  मिला था. मैंने उसके मालिक को ढूंढकर बैग लौटा दिया. तब इस अखबार वाले ने यह समाचार सिर्फ दो लाइनों में छापा था और वे दो लाइनें भी पता है कहाँ ? सातवें  पेज पर खोया-पाया और टेंडर-नोटिस के विज्ञापनों के बीच ."
मैंने कहा " ओह तभी उस समाचार पर मेरी निगाह नहीं पड़ी..."
राम औतार ने कहा " तुम्हारी क्या किसी की नहीं पड़ी . खुद मुझे चश्मा लगा कर वह खबर ढूंढनी पड़ी थी "
मैंने कहा " बहुत बुरी बात है . उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था, बल्कि ऐसी न्यूज़ तो फोटो समेत फ्रंट-पेज पर छापनी थी..."
राम औतार बोला " तुम्हारी कही यही बात जब मैंने सम्पादक से कही तो वो चिढ गया .कहने लगा तू कोई मल्लिका शेरावत है जो तुझे फ्रंट-पेज पर छापूँ ? सातवें पेज पर भी न्यूज़ इसलिए छाप दी कि एक विज्ञापन आना था और वो आया नहीं इसलिए जगह बची हुई थी ."
मैंने पूछा " फिर ? "
राम औतार बोला " मैंने सम्पादक को धमका दिया और कह दिया कि एक दिन ऐसा भी आएगा  जब दाड़ी वाले बदसूरत राम औतार नाम की इस मल्लिका शेरावत की फोटो तू ही छपेगा और वह भी फ्रंट-पेज पर. बस फिर तो वह बहुत चिढ गया और बोला ऐसा इस जन्म  में तो होगा नहीं क्योंकि हमने अखबार बेचना है , बंद नहीं कराना ."
मैंने कहा " चल आज उसको चिढा कर आते हैं कि राम औतार की फोटो तुमने ही ..."
राम औतार बोला " मै वहीँ से आ रहा हूँ . सम्पादक ने न केवल मुझे चाय  पिलाई बल्कि पिछली बातों के लिए माफ़ी भी मांगी ."
मै हैरान रह गया , मैंने कहा " तुमने पूछा नहीं कि अब फोटो कैसे छाप दी ?"
राम औतार हंसा " चाय पीते-पीते पूछा था ."
मैंने डरते-डरते पूछा " सम्पादक क्या बोला ? "
राम औतार बोला " कुछ नहीं यार , सर झुका कर बोला हमने अख़बार बेचना है .."
अब मैं  या आप क्या बोलें अंकल , सम्पादक ने एक लाइन में सब कुछ ही तो कह दिया .
आपका अपना बच्चा
मन का सच्चा,
अक्ल का कच्चा
प्रदीप नील 

कौन ? मैं हूँ मौन !

 आदरणीय अन्ना अंकल,
                  आप इन दिनों मौन धारण किए हुए हैं तो बोलेंगे नहीं . चुपचाप बैठे रहने से टाइम पास नहीं होता . ऐसे में आप आज्ञा दें तो एक कहानी सुनाऊं ? .
 अंकल जी, एक बाबा था बहुत ही ज्ञानी-ध्यानी. पूरा गांव उसकी बहुत कद्र करता था क्योंकि वह तन-मन का सच्चा तो था ही, किसी से कुछ मांगने भी नहीं जाता था . गांव वाले अपनी श्रद्धानुसार जो कुछ भी उसे दे जाते, खा लेता और परमात्मा का भजन करता .
      पांच-सात मुस्टण्डों को लगा कि यह तो बड़े मजे का काम है कि दाढी बढाओ और बाबा की शरण चले जाओ. हींग लगे न फिटकरी, रंग भी चोखा आए . बाबा को कंधों पर उठा कर उसकी जय बोलने लगे.
जय बोलने पर हर कोई फिसल जाता है बेचारा भोला बाबा भी फिसल गया . अब ये चेले तसल्ली देने लगे ” अब देखना बाबा. हम गांव में जाया करेंगे और इतनी भिक्षा मांग लायेंगे कि बड़ा सा मंदिर बना देंगे. आप उसमें मज़े से भक्ति करना. आपकी भक्ति हो जाएगी और पूरे गांव के पापियों का कल्याण भी हो जाएगा.“ 
बाबा को उनके रंग-ढंग कुछ ठीक तो नहीं लगे पर उन्हे चेले बना ही चुका तो करता भी क्या, बेचारा. लेकिन, स्याने बाबा ने एक बात जरूर कही ” सब बातें बेशक भूल जाना मगर इतना जरूर याद रखना कि मैं साल में एक दिन शीर्षासन  लगा कर मौन धारण किया करता हूं. उस दिन दुनिया बेशक इधर से उधर हो जाए लेकिन  मैं किसी से कोई बात नहीं करूंगा .“
मुस्टण्डों ने इस बात को एक कान से सुना और दूसरे से निकाल भी दिया और गांव में जा कर धर्म के नाम पर चंदा इकट्ठा करने लगे. गांव ने पूरा सहयोग दिया और बाबा के साथ उनकी जय भी बोली जाने लगी . लेकिन अंकल, स्यानों ने सही कहा है कि पेट और जेब दोनों भर जायें तो उसके बाद हर किसी का काण्ड करने का मन होता है .
बस फिर वही हुआ और उनमें से एक मुस्टण्डे ने गांव में घोषणा कर दी कि मंदिर-वंदिर छोड़ो, इस चंदे से हम दूकान खोलेंगे और दूकान से मुनाफा आएगा उससे मंदिर भी बनवा देंगे . अब तो पूरा गांव क्रोधित हो कर उनके पीछे और मुस्टण्डे बाबा की तरफ भागे जायें . मुस्टण्डे यह सोच कर कि बाबा के कहने से शायद  गांव वाले उनकी बात मान लें . बाबा ने दूर से देखा, माज़रा समझा और चिमटा गाड़ कर शीर्षासन  लगा गया.
अब चेले दूर खड़े-खड़े देखें  कि बाबा बचाएगा लेकिन बाबा तो मौन धारण कर चुका था .
नतीजा यह हुआ कि मुस्टण्डों की गांव वालों ने बहुत भर्तसना की और घोषणा  कर दी कि ये चेले कोई भक्त नहीं बल्कि व्यापारी ही निकले . हां, बाबा जरूर बाबा ही है .
इससे आगे की कहानी तब सुनाऊंगा जब आप फिर कभी मौन धारण करेंगे . बुरा न मानें तो एक बात पूछूं  अंकल जी, उस बाबा का मौन धारण करना तो मुझे समझ आता है लेकिन यह नहीं समझ आता कि आप बार-बार किस बात पर मौन धारण कर जाते हैं ?
अब मौन खत्म करो तो अगली कहानी आप सुनाना, अंकल. हम बच्चों को बड़ों को कहानी सुनाने में उतना मज़ा नहीं आता जितना उनसे सुनने में आता है .
सुनाओगे न अंकल ?
आपका अपना बच्चा,
मन का सच्चा,
अकल का कच्चा
--- प्रदीप नील

भगवां वस्त्रों की महिमा


  आदरणीय अन्ना अंकल,
हमारा पड़ौसी राम औतार बहुत गंदा है . हमेशा  तेरहवीं बात करता है .
कल कहने लगा ” जी तो करता है कि बम ले कर सारे स्कूल-कालेज तबाह कर दूं .“ 
उसकी यह बात सुन कर मेरी ऊपर की सांस ऊपर रह गई और नीचे की नीचे. मैंने कहा ”होश में तो हो जो सरस्वती के मंदिरों को गिराने की बात कर रहे हो ? तुम्हे शर्म आनी चाहिए .“
राम औतार हंसने लगा, बोला ”शर्म तो आनी चाहिए इन स्कूल-कालेजों को जो नकली विषय  पढा कर बेरोजगारों  की फौज़ पैदा कर रहे हैं . बाद में ये बच्चे पैंट-शर्ट पहनना सीख जाते हैं और शर्म के मारे इनसे मज़दूरी भी नहीं होती. फिर ये सारी उम्र भूख मरते हैं और सरकार तथा देश  को कोसते हैं “
अंकल जी, उसने वर्तमान की तस्वीर तो सही खींची थी इसलिए मैं भी सोच में डूब गया . जब कुछ भी फैसला नहीं कर पाया तो मैंने राम औतार से पूछा ”तो तुम्हारे हिसाब से क्या होना चाहिए ?“ 
राम औतार कहने लगा ”ऐसी पढाई होनी चाहिए कि बच्चा मात्र दस साल में करोड़पति होना सीख जाए .“
मैंने चिल्ला कर कहा ” आ गया न अपनी दो पैसे वाली  टुच्ची औकात पर . अब तुम पांच-सात नेताओं के नाम गिना कर बताओगे कि फलां नेता पहले सब्जी बेचता था, और फलां नेता ...“
राम औतार ने बात काटते हुए कहा था ”बिलकुल नहीं. खादी वाली  नेतागिरी के इस धंधें में आजकल पैसा कम है, बदनामी ज्यादा . मैं तो वो विषय  बता रहा था जिसमें पैसा भी है और इज़्ज़त भी .यानि, भगवां वस्त्रों में नेतागिरी.  इसके लिए  करना सिर्फ इतना है कि चारों तरफ गुरूकुल खुलें और उनमें प्राचीन वेद-शास्त्रों का ज्ञान दिया जाए तो हर छात्र करोड़पति हो सकता है .बस शर्त सिर्फ इतनी है कि वह इतना बडबोला हो कि अपनी बात नीचे न पड़ने दे, बीए या एमबीए किए बिना भी चीज़ें बेच सकता हो , देश  की हर समस्या के लिए नेताओं को जिम्मेवार ठहरा सकता हो और उसे भगवां पहनना अच्छा लगता हो .“
मैंने पूछा ” आप भगवां वस्त्रों पर इतना जोर क्यों दे रहे हैं ? मैंने तो सुना है कि ये वस्त्र पहन कर पैसा कमाना तो दूर, खुद अपना राज-पाट तक छोड़ने का मन करने लगता है“.i
राम औतार गुस्से हो गया ” किससे सुना है, गधा कहीं का ! कितने ही बाबा -बाबियां हैं देश  में जो लोगों को मोह-माया से दूर रहने का उपदेश  दे कर ही करोड़पति हो गए .तुम्हारी आंखें हैं कि बटन ?“
मैंने हाथ जोड़े ” सही कह रहे हो, मालिक . सब समझ आ गया लेकिन इतना नहीं समझ पाया कि भगवां किस लिए..?“
राम औतार कहने लगा ” भगवां वस्त्र संसार का आठवां आश्चर्य  है क्योंकि, रोज ही देश  के किसी न किसी हिस्से  में भगवां वालों की पोल खुल रही है फिर भी इसके प्रति लोगों का सम्मान खत्म नहीं होता. और फिर ये  दिव्य-वस्त्र हैं ही इतने सुविधाजनक कि पूछो मत . जब तक चेलों के सामने अकड़ बनी रहे, इन्हे सजाए रखो लेकिन जान बचाने के लिए दूसरे वस्त्र पहनने हों तब इन्हे उतार फैंकने में भी मात्र  एक ही सेकिण्ड लगता है .“
अंकल जी, राम औतार की बात सुन कर मेरे दिमाग ने तो काम करना ही बंद कर दिया है . अब आप ही बताईये उसकी बात ठीक है या गलत ?
आपका अपना बच्चा,
मन का सच्चा,
अकल का कच्चा
- प्रदीप नील 


गुरुवार, 23 अगस्त 2012

बहू लायेंगे इंग्लैंड से

  आदरणीय अन्ना अंकल,
  बेटी बचाओ के नारों के इस दौर में एक नारे ने मेरी नींद हराम कर रखी है . यह नारा लगभग हर मंच से गूंजने लगा है ”बेटी नहीं बचाओगे तो बहू कहां से लाओगे ?“
 देखने में यह नारा बेटियां बचाने के पक्ष में लगता है जबकि वास्तव में ऐसा है नहीं . इसमें चिंता बेटी बचाने को ले कर नहीं बल्कि अपने लाड़ले के लिए बहू लाने  को ले कर है कि बेटियां अगर नहीं बचाई गई तो आपके बेटे रण्डुए रह जायेंगे और आपने दहेज़ में एक किलो सोना और कार लेने का या बाद में बहू को जला कर आनन्द लेने का जो सपना देख रखा है, वह अधूरा रह जाएगा. कोई माने या न माने, लेकिन नारा साफ कह रहा है कि और लोगों  को बेटियां बचानी ही चाहिए ताकि हमारे  बेटे को बहू आसानी से मिल जाए. क्योंकि भारत ने अभी इतनी तरक्की तो की नहीं कि कोई अपनी ही बेटी को बहू बना ले .तो मतलब साफ है कि ये नारा यह नहीं कहता कि बेटियां हम बचाएं बल्कि यह सुझाव दे रहा है कि जहाँ हमारे बेटे का रिश्ता  हो सकता है, वे परिवार बेटियां बचाएं ताकि हम बहू ले आएं  . यानि, कुला जामा  बात तो यह हुई कि सारा मामला बहुओं को बचाने का है, बेटियों को बचाने का नहीं . शायद  इसी बात पर गालिब ने कहा था :
  ” वो कहते हैं मेरे भले की
    लेकिन बुरी तरह “
दूसरी बात ये कि यह नारा चुनौती देता है कि बहू कहां से लाओगे ? चुनौती जब भी कोई देता है, हम भारतवासी आगे बढ कर स्वीकार कर लेते हैं. सारे भारतवासी न सही हमारा पड़ौसी राम दुलारे तो स्वीकार कर ही लेता है. कल ही हमारे मोहल्ले के मंच से नारा गूंजा ” बेटी नहीं बचाओगे तो बहू कहां से लाओगे ?“ राम दुलारे तुरंत चिल्लाया ” बिहार से, बंगाल से, उड़ीसा से . और अब तो इंटरनेट, फेसबुक का ज़माना है तो चैटिंग-सैटिंग करके पोलैंड  या होलैंड  से भी ले आयेंगे .“
मंच-संचालक को राम दुलारे का जवाब बहुत बुरा लगा . लेकिन राम दुलारे समझाने लगा कि इसी सवाल को ऐसे पूछो ”बहुएं नहीं बचाओगे तो बेटी कहां से लाओगे? यानी, पहले बहुओं को तो बचाना सीख लो , बेटियाँ तो खुद हो जायेंगी .
  इस बात पर भीड़ में बैठी कुछ सास टाइप औरतें नाराज़ हो गई कि यह मुआ भी ज़ोरू का गुलाम निकला ! कोई हम बूढियों का पक्ष भी तो ले, सास को बचाने की बात क्यों नहीं कहते, हरामियो ?
तब से बेचारा मंच-संचालक अपना सर पकड़े बैठा है कि बेटियां बचाने के लिए वह क्या नारा लगाए ? इतना तो वह भी जानता है कि बेटियां नारे लगाने या उनकी घुड़चढी करवा देने से नहीं बचती . खुद जब वह पिछले साल अपनी पत्नी को मैटरनिटी होम ले कर जा रहा था तो उसकी मां ने कहा था ” चांद सा बेटा ले कर आना . ईंट-पत्थर मत ले आना .“
ऐसे में आप ही हमारी मदद कर सकते हैं यह समझा कर कि बेटियां ईंट-पत्थर  नहीं होती बल्कि वे  तो छुई-मुई का पौधा होती हैं जिन्हे खाद-पानी और खुला आसमान तो चाहिए ही, अनचाहे स्पर्श  से भी दूर रखे जाने की भी वे मांग करती हैं .
आपका अपना बच्चा,
मन का सच्चा,
अकल का कच्चा
- प्रदीप नील 

शनिवार, 18 अगस्त 2012

फव्वारा चौक का अन्ना ?

     

आदरणीय अन्ना अंकल,
                  आपने भ्रष्टाचार  के खिलाफ जो आंदोलन छेड़ा उसका नतीज़ा यह हुआ कि आम आदमी अब सिर्फ नेताओं और कर्मचारियों को चोर मानने लगा है और उसे अपनी कोई भी कमी नज़र नहीं आती.
 अब  देखो न अंकल , औसत दूधिया दोनों समय पानी मिला कर दूध बेचता है और फिर भी  यह दावा करता है कि वह तो किसी तरह बच्चों का पेट पाल रहा है. इन नेताओं को देखो ना जो करोड़ों खा गए. बिल्कुल यही बात बिजली और पानी की चोरी करने वाला सोचता है और यही बात वह भी कहने लगा है जो नकली घी बनाता है या सोने में पीतल मिलाता है . किसी का बिना हैल्मेट के चालान कटने लगता है तो उसकी यही दलील होती है कि पुलिस वाले खुद तो हैल्मेट पहनते नहीं और हमारा चालान काटते हैं . यानि हर चोर अब नेताओं को चोर बता कर खुद को सही ठहराने  लगा है .
 अंकल जी, आप तो हमें शायद  यह सिखा रहे थे कि शराब  से कीड़े मर जाते है़ं इसलिए यह हानिकारक है जबकि हमने यह समझा कि शराब अच्छी चीज़ है जिसे पीने से पेट के कीड़े मर जाते हैं . आप को लगता नहीं कि आप कैसे-कैसे  चेलों के गुरू हो गए ?
इससे भी बड़ी बात तो यह अंकल जी, कि हम लोगों की नज़दीक की नज़र बहुत  कमज़ोर हो गई है और दूर की बहुत तेज.  हमें दिल्ली के राम लीला मैदान में खड़ा अन्ना तो दिखता है लेकिन मेरे अपने  शहर  के फव्वारा चौक पर खड़ा रहने वाला अन्ना नहीं दिखता . यह अन्ना ना तो खादी पहनता है और ना  गांधी टोपी ही  बल्कि पुलिस की वर्दी में  हर समय हैल्मेट पहने खड़ा रहने वाला हमारे शहर  का ट्रेफिक-इंचार्ज़ देवा सिंह है.  लेकिन हम इतने बेशर्म  हो चुके हैं कि हेलमेट लगाए धरती पर खड़े उस देवा सिंह के  पास से बिना हैल्मेट लगाए बाईक पर गुजरते रहते हैं और एक पल भी नहीं सोचते कि खाकी वर्दी वाला यह आदमी सारा दिन हैल्मेट क्यों पहने रहता है और तब भी जब वह बाईक पर नहीं होता  बल्कि चौक पर  खड़ा होता है ? इसके हाथ में लाठी नहीं है इसलिए हम इसे पुलिस वाला नहीं मानते और इसने गांधी टोपी नहीं पहनी इसलिए हम इसे अन्ना भी नहीं मानते. हम अन्ना का भक्त उसी को मानने लगे हैं जो कुछ भी करे लेकिन टोपी लगा ले जिस पर लिखा हो ” मैं भी अन्ना “ लेकिन यह बात हम बेवकूफों को कौन समझाए कि अन्ना तो मन से अन्ना होता है उसने चाहे गांधी टोपी पहन रखी हो या हैल्मेट .
खाकी वर्दी में कहते हैं बहुत नशा  होता है लेकिन इस इंस्पेक्टर को देख कर यह बात झूठ लगती है .यह नशे की बजाए प्रेरणा से लोगों को समझाना चाहता है . लेकिन हम जूत्ते से समझने वाले लोग....
कल को यही देवा सिंह पुलिसिया लाठी उठा कर खड़ा हो जाए कि आओ मेरे प्यारो आज देखता हूं कौन मेरे पास से बिना हैल्मेट लगाए गुजरता है ? तब क्या होगा ? लोग या तो रास्ता बदल जायेंगे या हैल्मेट लगा कर ही उधर से गुजरेंगे .लेकिन वही दलील फिर भी देंगे कि नेता तो देश  को लूट के खा गए उनका कोई पुलिस वाला  कुछ बिगाड़ता नहीं, हमने क्या अपराध किया है , एक छोटा सा हैल्मेट ही तो नहीं पहना .अंकल जी, आप को लगता नहीं कि आप कैसे-कैसे भक्तों के देवता हो गए ? 
आपका अपना बच्चा,
मन का सच्चा,
अकल का कच्चा
--- प्रदीप नील

रविवार, 10 जून 2012

सुनो अन्ना,
                         मन डोले, मेरा तन डोले

आदरणीय अन्ना अंकल,
  कल मैं भक्तों के हाथों और लातों बुरी तरह पिटा .पर अब सोचता हूं कि गलती तो मेरी ही थी.
असल में हुआ यूं, अंकल जी कि हमारे महल्ले में भजन-कीर्तन का आयोजन हो रहा था . अब थोडे़ बहुत पाप मैं भी कर लेता हूं इसलिए सुधरने के लिए वहां चला गया और पूरी श्रद्धा सहित हाथ जोड़ कर बैठ गया .मंच पर एक बहुत ही सुंदर गायिका प्रकट हो गई तब भी मैंने अपनी आंखें कस कर बंद रखी और परमात्मा में ध्यान लगाने की कोषिष करने लगा .गायिका ने आलाप लिया और गाना षुरू कर दिया ”भोले न्यूं बोले, षिवजी न्यूं बोले... “
और मेरी आंखें खुल गई कि यह तो ” मन डोले, मेरा तन डोले..“ की धुन है .सभी भक्त झूम रहे थे पर मेरा ध्यान गायिका के षब्दों पर लग ही नहीं पा रहा था पुरानी फिल्म ”नागिन“ का मन डोले... गीत याद आ रहा था .
और मैं खड़ा हो गया . मैंने कहा ” आप हमें पाप से दूर ले जाने के लिए भजन गा रही हैं .और खुद धुन चोरी कर रही हैं .क्या सिखाएंगी आप हमें ?“
नतीज़ा यह हुआ कि भजन भूल कर गायिका सन्न खडी़ रह गई .चारों तरफ षोर मच गया . कोई मुझे नषेडी़ कह रहा था, कोई कह था कि रावण का वंषज है जो भक्ति में विघ्न डालने आ गया .और भजन-मंडली का सोचना था कि आजकल सारे ऐसे ही तो गाते हैं और मुझे ज़रूर ही उनके प्रतिद्वंदी ने भेजा है कढी बिगाड़्ने के लिए .बस माईक से एक ही षब्द आया ”मारो“
अंकल जी, अपने देष में ” मारो “ कहने की तो ज़रूरत ही नहीं पड़ती क्योंकि भीड़ में घुस कर मारना तो हमारा मुख्य-धंधा है .तब आपके इस बच्चे की क्या हालत हुई होगी, आप सोच ही सकते हैं .
वैसे अब मुझे अपनी गलती समझ आ रही है . मुझे चाहिए तो यह था कि एक आंख बंद करके मुण्डी हिलाता रहता और भजन को सुनता या देखता रहता . कितना पुण्य मिलता ! पर मुझसे ऐसा नहीं हो पाया इसलिए वहीं पिट गया और पाप की सज़ा पा गया .
अंकल जी, अब भजन-कीर्तन में जाने से डरने लगा हूं .क्या आप थोड़ा पिघला हुआ षीषा भिजवा देंगे ? इसे मैं अपने कानों में भरवा लेना चाहता हूं .
आपका अपना बच्चा,
मन का सच्चा,
अकल का कच्चा
- प्रदीप नील

रविवार, 15 अप्रैल 2012

अपनी- अपनी गरीबी रेखा

                                                                अपनी- अपनी गरीबी रेखा

आदरणीय अन्ना अंकल,
मेरा एक मित्र है राम औतार . करोड़पति है, कोठी -कार और सब सुविधाएं उसके पास हैं लेकिन चाय पीने का मन होने के बावज़ूद जेब से पांच रूपए नहीं निकालना चाहता और तलाश  में रहता है कि कब उसे कोई चाय-बीडी़ पिलाने वाला मिले . ऐसे में मैं उसकी औकत मात्र पांच रूपए ही समझता हूं और चाहता हूं कि मेरा वह मित्र अपने आप को गरीबी रेखा से नीचे मान ले लेकिन मित्र है कि उसे अपने आप के करोड़पति होने का घमण्ड रहता है . मैं सरकार होता तो उसे यकीनन ही गरीबी रेखा से नीचे रखता और वह इस बात पर मुझे कोसता. यानि सरकार की फज़ीहत तो तय है .
 मेरा दूसरा मित्र राम खिलावन झोंपडे़ में रहता है .दाने-दाने का मोहताज़ है लेकिन घर में दो मोबाइल फोन हैं और हर शाम  देसी शराब  का अद्धा पता नहीं कैसे उसके पास आ जाता है . उसे दुख है कि उसके पास साईकिल ही क्यों है , बाईक क्यों नहीं ?  वह चाहता है कि उसे गरीबी रेखा से नीचे मान लिया जाए और सरकार उसके आठों बच्चों को पाले . मैं सरकार होता तो उसे गरीबी रेखा से ऊपर मानता . जिसके घर में केबल टी वी हो, दो मोबाइल हों ,हर शाम  शराब  का जुगाड़ हो और जो  आदमी बेचारी सरकार तक को अपने बच्चों की आया बनाने के सपने देखता हो उसे गरीबी रेखा से नीचे रखना तो रेखा की बेइज़्ज़ती होती .ऐसे में मैं सरकार होता तो यकीनन ही राम खिलावन मुझे गालियां देता . यानि, सरकार की फज़ीहत तो तय है .
सच तो यह है कि इस गरीबी रेखा की शक्ल  जिसने बिगाड. रखी है वह औरत हमारे महल्ले में रहती है . कुछ साल पहले जनगणना हुई थी तो पता चला था कि वह हर सेकिण्ड एक बच्चे को ज़न्म दे डालती है . अब मुझे पूरा यकीन है कि वही औरत आज़कल हर सेकिण्ड तीन नहीं तो कम से कम दो या डेढ बच्चे तो ज़रूर ही पैदा करने लगी है .
और उस औरत के सामने बेचारी सरकार मुझे तो सातवीं क्लास को पढाने वाली ड्राइंग भैंजी लगती है . भैंजी बेचारी ब्लैक-बोर्ड की तरफ मुंह करके गरीब बच्चों के चारों तरफ गरीबी रेखा खींच रही होती है कि पीछे से वह औरत दो बच्चे उसे रेखा के पास गिरा कर ताली बजा कर हंसती है और मज़ाक उड़ाने लगती है कि ऐसी औरत को किसने भैंजी लगा दिया जिसे सही रेखा ही नहीं खींचनी आती .भैंजी हैरान-परेशान  होकर वह रेखा मिटाकर दूसरी बना ही रही होती है कि वह औरत पांच बच्चे फैंक कर भैंजी को मूर्ख साबित कर देती है . यानि, सरकार की फज़ीहत तो तय है .
लोग सरकार की बनाई गरीबी रेखा से खुश   नहीं होते और हरेक को शिकायत  बनी रहती है .
 जिस तरह जितने मुंह उतनी बातें, उसी तरह जितने लोग उतनी ही गरीबी रेखाएं . ऊपर से दिक्कत यह कि आज़कल लोग मुंह भी दो-तीन रखने लेगे हैं .ऐसे में क्या हो सकता है ?  यानि, सरकार की फज़ीहत तो तय है .


आपका अपना बच्चा,
मन  का सच्चा,

अकल का कच्चा

- प्रदीप नील

शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

कहाँ है भगत सिंह की दुल्हन ?

 आदरणीय अन्ना अंकल,
कल मैंने हमारी कक्षा की दो लड़कियों की बातें छुप कर सुनी।, आपको बता दूं
” भगत सिंह कितना रोमांटिक रहा होगा, ना?“
” तुम्हे कैसे पता ?“
” क्यों हिस्ट्री के पीरियड में मैडम बता तो रही थी कि उसने सपने तो देखे किसी ”क्रान्ति“ के लेकिन दुल्हन बना लिया ”आज़ादी“ को . इसी अफेयर की वज़ह से तो उसे प्राण भी गंवाने पडे़ .“
” सो सैड. मारा गया बेचारा. मैं तो कहती हूं यह ओनर-किलिंग रही होगी “
” सो तो है ही. इस क्रान्ति ने भी जाने कितने लड़कों को मरवाया होगा “
” यू मीन, क्रान्ति इतनी बेकार है?“
”और नहीं तो क्या ? नहीं तो आज़ भी लड़के हमारी बजाए उसी के पीछे न भागते?“
” सही कहा. वैसे टीचर ने क्या बताया भगत सिंह की दुल्हन का क्या हुआ?“
” स्टुपिड ओनर-किलिंग एक तरफा नहीं होती . किसी न किसी ने तो उसे भी ज़रूर ही मारा या टार्चर किया होगा?“
     अंकल जी उसके बाद की बातें नहीं सुन पाया क्योंकि चेतना और जागृति नाम की ये दोनों लड़कियां विवेक और चेतन्य नाम के लड़कों के साथ गप्पें हांकने लगी, जो इन्हे खोजते हुए यहां आ गये थे.
   अंकल जी आप ही बताईये, जिस देश  की चेतना और जागृति इतनी स्टुपिड हों , और जिस देश  के विवेक और चेतन्य उनके पीछे चक्कर काटते हों, उस देश  को गुलाम होने से कोई रोक सकता है?
       वैसे उन बेवकूफ लड़कियों के एक सवाल में मैं अभी तक उलझा हूं कि भगत सिंह की दुल्हन का क्या बना होगा ? भगत सिंह की ओनर-किलिंग तो सभी जानते हैं किसने की थी .
आपका अपना बच्चा
मन का सच्चा
अकल का कच्चा
प्रदीप नील
                                 

गुरुवार, 10 नवंबर 2011

नेता का दिमाग घुटने में ?

आदरणीय अन्ना अंकल ,
कल हमारे संगीत वाले सर हमें देशभक्ति का गाना सिखा रहे थे,लेकिन बहुत ही गुस्से में थे. बोलने लगे,“ बच्चो,कहां का देश,और कैसा देश ! तुम्हारे सामने भला-चंगा खडा हूं.मुझे तो कल रिटायर होना पडेगा. और इधर नेता हैं कि 70 साल के हो जाएं,घुटने काम ना कर रहे हों,तो भी उन्हे रिटायर करने वाला कोई नहीं है.“
यह अन्याय की बात सुनकर हम तो हैरान रह गए, अंकल जी.
तभी चपडासी पानी लेकर आया,प्रिंसीपल को गालियां देता हुआ. सर की बात सुन कर बोला,“देश तो अब पाताल को जाएगा ही. यहां अंधे तो बच्चों को संगीत सिखाते हैं“
यह सुनते ही संगीत वाले सर चिढ गए. चिल्लाए,“ बकवास क्यों करता है,राम औतार के बच्चे ? मैंने संगीत गले से सिखाना होता है, आंखों से नहीं “
राम औतार उसी तर्ज़ पर बोला,“ तो तू भी जान ले,राम लुभाए कि नेता ने देश दिमाग से चलाना होता है, घुटनों से नहीं “
यह बहस ज्यादा देर नहीं चली, क्योंकि दोनो एकदम से “नवीन भारतीय संस्कृति“ पर उतर आए.यानी संगीत वाले सर जी तबले पर थाप की तरह राम औतार के सिर पर सितार मारने लगे. राम औतार इस भरोसे के साथ कि प्रिंसीपल उसने बनना नहीं,चपडासी से नीचे कुछ बना सकते, हुक्म बजाने की तरह सर के सिर पर जूत्ता बजाने लगा.
हम सभी ज़ोर-ज़ोर से रोने लगे तो पूरा स्कूल भागकर आया और उन्हे छुडवाया.
अंकल जी,हम तो हैरान रह गए कि इस तरह तो हम बच्चे भी नहीं लडते. जब हम बच्चे लडते हैं तो सारे सर एक ही बात कहते हैं “तुम्हारा क्या मकान बंट रहा था,जो बंदूक निकाल ली ?“ आज हमें समझ नहीं आया कि  यहां कौन सा मकान बंट रहा था?
अंकल जी,हमें सबसे घटिया बात तो यह लगी कि ये बड़े  लोग एक दूसरे की शारीरिक अक्षमता का मज़ाक उडा रहे थे.कोई अपाहिज या बीमार है तो इसमें उस बेचारे का क्या कसूर?
घर जाकर  दादा जी से मैं पूछने लगा कि नेता को किस उम्र में रिटायर होना चाहिए ?
दादा जी गुस्से से  बोले ' मैं कोई नेता तो हूँ नहीं . किसी नेता से ही पूछ ले जो सत्तर साल से ऊपर का हो ".
अब आप ही बताइए अंकल कि यह बात किससे पूछूं ?
आपका अपना बच्चा
मन का सच्चा
अकल का कच्चा
प्रदीप नील 

मंगलवार, 8 नवंबर 2011

”नो स्नान-नो मतदान“

कल हमारे नेता राम औतार ने मुझसे कहा“ अन्ना के भतीजे, सुन,मैं चुनाव-सुधार अभियान में योगदान देना चाहता हूं,इतिहास में दर्ज़ कर लेना. अपने अंकल से बोलना कि मेरे सुझाव ये हैं :
(1).तीसरी क्लास का बच्चा भी जानता है कि ”नेता” शब्द पुलिंग है और ”जनता” स्त्रीलिंग. जनता नाम की लडकी को उम्मीदवार नाम के 10-15 लडकों में से किसी एक को पसंद करना होता है. इस प्रकिया का नाम चुनाव नहीं बल्कि ”स्वयंवर” है. अतः सबसे पहले इसका नाम बदला जाए.
(2).कुछ मतदाता पैसा हमसे लेते हैं,वोट किसी और को दे आते हैं. यह “ साई और को,बधाई किसी और को“ टाइप भ्रष्टाचार  बंद होना चाहिए. इसके लिए बिल लाया जाए.
(3). चुनाव के वक्त कुछ लोग घोषणा  कर देते हैं कि उनका जब तक अमुक  काम पूरा नहीं होगा,वे मतदान नहीं करेंगे.यह व्यवहार उस बुआ जैसा है जो भतीजे की शादी में रूठ जाती है.
फूफाओं से कहिए कि ऐसी बुआओं पर लगाम लगाएं.
(4). चारों तरफ “स्वच्छ“चुनाव प्रकिया पर ज़ोर दिया जा रहा है, लेकिन इधर किसी का ध्यान नही है कि मतदाता बूथ पर नहाकर भी आया है,या नहीं ? पोलिंग अफसर को चाहिए कि मतदाता को सूंघकर,तसल्ली होने के बाद ही वोट डालने दे. आगामी चुनावों का नारा भी सुझा देता हूं ”नो स्नान-नो मतदान“
(5). मतदाता ने मत किसको दिया,इस बात की पूरी गोपनीयता रखी जा रही है. अबे, मैं पूछता हूं कि यह मतदान है या गुप्तदान ? वोटर को वोट डालने का हक है, तो हमें लेने का भी तो है. किस बात का दान ? अगर आप मेरे सुझाव नंबर एक को दोबारा देखें तो दान टाइप कोई और शब्द आप ही बता देंगे.
(6). पोलिंग बूथ अक्सर स्कूलों में बनाए जाते हैं. हमें पढाने वाले गुरू जी रोज कहते थे कि स्कूल के बच्चों और बंदरों में कोई फर्क नहीं होता.स्कूल में घुसते ही मतदाता का मन कैसा हो जाएगा,सोचना ज़रा? भगवान न करे, भेड-फार्म में पोलिंग बूथ हो तो? जब सुधार ही करना है तो सारे बूथ “सुधार-गृह“ में होने चाहिएं. विचार भी शुद्ध  रहेंगे, प्रकिया भी.

बाप रे बाप! अंकल जी, आप भी यह क्या सुधार का झमेला ले बैठे ? मुझे तो नहीं लगता, हम राम औतार का एक भी सुझाव, इस जन्म में लागू कर पायेंगे.
  चिट्ठी आपको इसलिए लिख दी कि कल को कोई यह न बोलने लगे कि ये नेता लोग ही चुनाव सुधार के पक्ष में नहीं हैं.
आपका अपना बच्चा
मन का सच्चा
अकल का कच्चा
प्रदीप नील

रविवार, 6 नवंबर 2011

अन्ना, मेरा बाप चोर है

आदरणीय अन्ना अंकल ,
मम्मी ने अनशन पर जाने की धमकी दी तो  पापा डर गए और हमारे घर में नया ए.सी. लग गया.
लग तो गया लेकिन पापा मुंह लटका कर बोले “बिल“
मम्मी हंसने लगी, “ कौन सा,लोकपाल या जन लोकपाल ?“
पापा झल्लाए, “नालायक, मैं बिजली के बिल की बात कर रहा हूं. अगले महीने बिल आएगा,तो ए.सी. का पता चलेगा.“
मम्मी मुस्कुराई, “तुम भी भोले शंकर  ही हो. दो दिन रूको फिर मेरा कमाल देखना.“
दो दिन बाद एक अंकल हमारे घर आए और बिजली की तार,मीटर और स्विच के साथ पता नहीं क्या करने लगे. मैंने पूछा तो पापा ने डांट दिया,“ जाकर गली में खेलो, दोस्तों के साथ “
अंकल जी, यह तो मेरे एक दोस्त ने बताया कि इसे बिजली चोरी कहते हैं. सुनकर मेरा तो मुंह उतर गया और सोचने लगा तो क्या मेरे पापा चोर हैं?
घर पर मम्मी ने डांट दिया, “क्यों दिमाग खराब करता है. सारे ही तो करते हैं. नेताओं को देख ना देश  को लूट कर खा गए.“
लेकिन, अंकल जी, मेरा दिमाग अभी खराब ही है. मेरे पापा चोर कैसे हो सकते हैं ? वे तो पूरा दिन अन्ना- अन्ना करते रहते हैं. कल कह भी रह थे कि अन्ना भ्रष्टाचार  के खिलाफ जो बिगुल बजा रहे हैं, उसका अच्छा नतीज़ा ही आएगा.
अंकल जी,मेरे पापा कभी दिखें तो डांटना ज़रूर. ऐसा न हो कि बिजली चोरी में हम पकडे जाएं और मुझे अपने हाथ पर लिखवाना पडे “मेरा बाप चोर है“
आपका अपना बच्चा 
मन का सच्चा 
अकल का कच्चा  
प्रदीप नील 


                                                                                                              

रविवार, 23 अक्टूबर 2011

कर लो जब्त : यह रहा काला-धन

                                                   कर लो जब्त : यह रहा काला-धन
 आदरणीय अन्ना अंकल,
हमारी गली का राम औतार अपना काला धन जब्त कराने के लिए अनशन कर रहा है,लेकिन सरकार है कि इसे काला धन ही नहीं मान रही.
राम औतार ने परसों गली के चौक पर स्टेज़ बनाई,लाऊड-स्पीकर लगाया और इस पर अपने अनशन की घोषणा  करते हुए सरकार के खिलाफ भाषण  शुरू कर दिया. तमाशा  देखने वालों को अपना समर्थक समझकर जोश  में भर गए और बोले कि  जब तक उनका काला-धन जब्त नहीं किया जायेगा, वे प्राण त्याग देंगे लेकिन हटेंगे नहीं.
       अंकल  जी , मरे से मरे भारतीय के घर भी 5-7 तोले सोना और आधा किलो चांदी दबी ही रहती है.लोग डरे कि खुद भी मरेगा और हमें भी मरवायेगा. यह यहां से हटे तो उनका भी पिण्ड छूटे. बस किसी ने खबरिया चैनल को फोन कर दिया. चैनल वालों के पास उस दिन कोई धमाकेदार न्यूज़ नहीं थी, सो बेचारों ने छतरी की तरह राम औतार पर कैमरा तान दिया.एंकर चिल्लाने लगा,“ धन्य है यह देशभक्त जिसका विवेक जागा और अपना काला धन सौंपने को तैयार है. सरकार कब तक छुप कर तमाशा  देखेगी?  उसे आना ही पडेगा, इसी ज़गह,  इसी चौक में....“
          और हार कर पुलिस-कप्तान को आना पडा. उन्हे लेकर राम औतार अपने घर की और चले. पीछे उनके समर्थकों की भीड. राम औतार के घर के आंगन में उनकी पत्नी खडी थी,मोटी और काले रंग की. राम औतार ने उसकी तरफ इशारा करते हुए हुए कहा,“ यही है मेरा काला धन.जब्त कर लो इसे.“
   कप्तान साहब का जी तो किया होगा कि इसे अभी एक झन्नाटेदार थप्पड दूं,लेकिन कैमरे के सामने यही कहा,“यह आपकी पत्नी है,बडे भाई. यह काली तो है लेकिन...“
     राम औतार उन्हे समझाने लगे,“ देखिए,शास्त्रों मे धन को लक्ष्मी कहा गया है,यह काली है तो काला धन हुआ कि नहीं? इसका नाम तो लक्ष्मी है ही, इसके बाप से मैंने मोटा धन दहेज़ के रूप में यानि दो नंबर में लिया था. अब बताओ,यह किस हिसाब से काला-धन नहीं है?“
  कप्तान साहब ने हाथ जोडे, “भाई साहब, काली औरतों को जब्त करने का कोई कानून नहीं है, ना ही कोई बिल.“
राम औतार अडे हुए हैं कि बिल नहीं है तो बना लो.
अंकल आप जूस पिला दें तो राम औतार अनशन तोड सकते हैं. ज़रा जल्दी आना क्योंकि टी वी वाले बहुत बोर कर रहे हैं, उन्होंने अपने चेनल की  पूरी स्क्रीन की रजिस्ट्री राम औतार के नाम  करा दी है
आपका अपना बच्चा
मन का सच्चा
अकल का कच्चा
- प्रदीप नील


बुधवार, 19 अक्टूबर 2011

  आदरणीय अन्ना अंकल,
मैं “व्यापारी और बंदर“ कहानी पढ रहा था तो मुझे लगा कि ऐसी कहानी  तो मैं भी लिख सकता हूं. लेकिन अंकल जी, यह कहानी इतनी मुश्किल  निकली कि मैं उलझ गया और आपकी मदद चाहिए.
मेरी कहानी में भी वही व्यापारी टोपियां लिए जा रहा था,रास्ते में पेड के नीचे बैठा और सो गया था.नींद खुली तो पाया कि उसकी पोटली तो वहीं थी,लेकिन टोपियाँ              गायब.                                                                                                                                                        उसने “हे भगवान !“कहकर ऊपर देखा तो चौंका क्योंकि उसी पेड पर बहुत सारे बंदर बैठे थे.बंदर टोपियां ओढ कर इतरा रहे थे, आत्म-मुग्ध हो रहे थे और कोई कोई तो एक दूसरे की फोटो भी खींच रहे थे, अखबार में छपवाने के लिए.
व्यापारी समझाने लगा,“बेटा ये टोपियां इज़्ज़तदार लोगों के लिए ले जा रहा था,तुम नकलची बंदरों के ये किसी काम की नहीं हैं.“
बंदर खी खी करके हंसने और व्यापारी को चिढाने लगे. व्यापारी फिर समझाने लगा,“ भाईयो,पहले इन्हे ओढने के लायक बन कर आओ,फिर पहनना.ये सिर्फ ”इन्सानों के लिए हैं“
बंदर बुरा मान गए कि  विज्ञान तो हमें इन्सानों का पूर्वज बताता है और यह व्यापारी  हमें इन्सान ही नहीं मान रहा. अब तो इसे टोपियां बिल्कुल नहीं लौटायेंगे.“
अंकल जी, पुरानी कहानी में तो व्यापारी समझदार था और बंदर मूर्ख. उसने अपनी टोपी उतार कर फैंकी तो नकलची बंदरों ने भी अपनी अपनी टोपी उतार कर फैंक दी थी.लेकिन मैं अटक गया हूं क्योंकि मेरी कहानी का व्यापारी इतना समझदार  नहीं है जबकि बंदर बहुत ही धूर्त
हैं.वे इस फिराक में हैं कि कब व्यापारी अपनी टोपी उतार कर  फैंके और वे उसे भी उठा ले जाएं.
अंकल जी,व्यापारी की मदद करके कहानी पूरी करवा दें. व्यापारी को टोपियां वापिस न मिल पाए तो भी चलेगा लेकिन कहानी का अंत ऐसा हो कि टोपियों की गरिमा बनी रहे.कम से कम इतनी ज़रूर कि ये टोपियां इसके सिर से उसके सिर न हो जाएं.
आपका अपना बच्चा
मन का सच्चा
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प्रदीप नील

रविवार, 16 अक्टूबर 2011

कौन सा भारत, अन्ना

 आदरणीय अन्ना अंकल,
           कल मैं बहुत रोया क्योंकि, फीस न दे पाने के कारण स्कूल से मेरा नाम कट गया.
और रात को मेरे पापा घर आए, शराब पीकर .लेकिन वे आज मम्मी की बजाए नेताओं को चोर तथा भ्रष्ट  बताते, गालियां देते आ रहे थे.
        मां गुस्से में तो थी ही, बोल दिया,“ तुम क्या कम हो? बच्चे की फीस की दारू पी गए.“
बस यह सुनने की देर थी कि पापा ने मां को बहुत मारा.मां ने “घरेलू-हिंसा कानून“ का नाम लिया तो पापा ने एक और जड दिया और बोले, “ यह इंग्लैण्ड नहीं है,राम दुलारी.यह भारत है,भारत .“
      मैंने रोकना चाहा तो पापा ने मुझे भी मारा. मैंने भी ”बाल-हिंसा कानून“  का नाम लिया तो पापा ने फिर मारा. मैंने चिल्लाकर कहा “ 100 नंबर पर फोन करके पुलिस बुलाता हूं “ तो पापा ने एक और जड दिया और बोले,“  यह इंग्लैण्ड नहीं है, राम लुभाया. यह भारत है, भारत .“
हमारा चिल्लाना सुनकर पडौसी भागकर आया तो पापा ने उसे भी मारा और बोले,“  यह इंग्लैण्ड नहीं है,राम औतार. वर्ना किसी के घर में यूं घुस आने पर जेल में होते.  शुक्र  मना कि यह भारत है, भारत.“
     अंकल जी, पापा ने तीन बार बोला ,“  यह भारत है, भारत. “ लेकिन वे किस भारत की बात कर रहे थे?  मैंने तो किताबों में पढा था कि भारत वह देश  है जहां नारी की पूजा होती है,बालकों पर दया, और पडौसियों से प्रेम.
   अंकल जी, कभी समय मिले तो मेरे पापा के कान खींचना और यह भी भी समझाना कि यह भारत ही है, इंग्लैण्ड नहीं .
   लेकिन जरा जल्दी करना क्योंकि मेरे पापा मारते बहुत हैं. मुझे मार से उतना डर नहीं लगता जितना किसी शराबी के मुंह से यह सुनकर लगता है,“  यह भारत है,भारत .“
                                        
आपका अपना बच्चा
मन का सच्चा
अकल का कच्चा
प्रदीप नील

शनिवार, 15 अक्टूबर 2011

नेता का करेक्टर ढीला

आदरणीय अन्ना अंकल,
कल मेरी गली के नेता जी के यहाँ शाम  को जोर से स्पीकर पर यह गाना बजना शुरू  हो गया “मैं करूं तो साला कैरेक्टर ढीला है“
     अंकल, पहले तो मैंने सोचा कि उनकी बिटिया का जन्मदिन होगा और इस गाने की ताल पर पूरा परिवार नाच रहा,जषन मना रहा होगा लेकिन फिर ध्यान आया कि इस अवसर पर इस गाने का क्या काम?जाकर देख ही लेते हैं कि माज़रा क्या है?
     अंकल,जाकर देखा, वहां तो सन्नाटा पसरा हुआ था, अंधेरे कोने में बैठे नेता जी खुद ही यह गाना गा रहे थे,पूरे ज़ोर से गला फाडकर मुझे तो उन पर बहुत दया आई। मुझे देखते ही फूट फूट कर रोने लगे । फिर आंखें पोंछकर बोले “बेटा,यह इलेक्षन इस बार मेरी तरफ से तुम्हे ही लडना होगा और सिर्फ तुम्ही क्यों,पूरे ही देश  का भार अब तुम जैसे 18 साल से कम उम्र के बच्चों पर है।
     मैंने कहा”सर,कानून 18 से नीचे वालों को इस काम की इजाज़त नहीं देता मुझे क्षमा करें“
    नेता जी तुनक कर बोले“ अपने अन्ना से बोलो न कि इस का बिल भी ले आएं“
मैंने पूछा ”सर, आपका मतलब क्या है,मैं समझा नहीं“
   नेता जी बोले“मेरा गाना सुनकर भी नहीं ?“ फिर अचानक तैश  में आ गए और बोले “इस पूरे देश  में शोर  मचा है कि देश  के सारे ही नेता चोर हैं। लेकिन है कोई 18 साल से उपर का ऐसा जो खुद किसी न किसी तरह के भ्रश्टाचार में न उलझा हो?“
मैंने कहा“सर,हाल तो 18 से कम वालों का भी बढिया नहीं है। हम भी मौका मिलते ही पापा की ज़ेब से पैसे उडा लेते हैं,इम्तिहानों में नकल करते हैं और बाईक पूरा दिन स्कूटियों के पीछे घुमाते रहते हैं“
नेता जी उलझन में दिखे,फिर बोले “तो अब क्या होगा?“
मैंने कहा “सर,एक रास्ता है मैं अन्ना अंकल को खत लिखता हूं। वे कम से कम इतना तो ज़रूर ही कर देंगे कि अपने इस हलके के लिए एक नेता जुटा दें । अपने देष में न मिले तो पाकिस्तान से तो मंगवा ही देंगे ”
यह सुनते ही नेता जी ज़ोर का ठहाका लगा दिया.
अंकल जी,मैं एक बात नहीं समझ पाया कि रो रहे नेता जी ने इतना ज़ोर का ठहाका क्यों लगया। मैंने तो चिट्ठी लिख दी,सो आप तक पंहुचे
                                      
                                  आपका अपना बच्चा
                                  मन का सच्चा
                                  अकल का कच्चा
                                  - प्रदीप नील 9996245222

मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011

अन्ना, किसने पिटवाया मुझे ?

 आदरणीय अन्ना अंकल,
   आपके इस बच्चे की  जान खतरे में है क्योंकि मेरी वज़ह से पहली बार मैदान में उतरा एक नया नेता चुनाव हार गया और अब वह मुझे मारना चाहता है. गलती सचमुच ही मेरी थी,जो आपके प्रभाव में आकर उसके लिए नीचे दिया गया चुनाव  घोषणा-पत्र बना बैठा.
(1) मैं किसी प्रकार के "साला-सालीवाद" में विश्वास  नहीं करता.
(2) बिजली,पानी तथा टैक्स-चोर मुझे यह सोचकर तो बिल्कुल वोट न दें कि मेरे जीतने के बाद उनके पौ-बारह हो जायेंगे.
(3) नकली या मिलावटी घी,दूध तथा शराब बनाने वाले मुझे वोट देकर शर्मिंदा न हों.चुनाव जीता तो उन्हे भी अंदर जाना ही होगा.
(4) सबसे बडी बात पर मतदाता गौर करें कि मुझे वोट देने से से पहले अपनी आत्मा में झांक कर देखें कि मुझे वोट क्यों देना चाहते हैं?
    अंकल जी, आप समझ ही गए होंगे कि बाकी और बातें जो मैंने लिखी,क्या रही होंगी?
लगभग वही बातें जो मजबूत लोकतंत्र के लिए ज़रूरी होती हैं. इसके बाद मैं यह सोचकर मज़े से सो गया कि देश  में आजकल अन्ना- आंधी चल ही रही है,मेरा पट्ठा जीतेगा और मुझे लाख दो लाख रूपए का इनाम तो पक्का ही देगा.
  लेकिन अंकल जी, उसके पक्ष में सिर्फ दो वोट आए और उन दो में से  एक भी पता नहीं कौन डाल गया.?नेता जी को चुनाव हारने का दुख नहीं है,दुख सिर्फ इस बात का है कि उनकी घरवाली ने भी उन्हे वोट नहीं दिया. अब नेता जी चार लोगों से यही कहते घूम रहे हैं "मैंने  साला-सालीवाद का नाम न लिया होता तो मैं चुनाव ज़रूर जीत जाता. घोषणा-पत्र का नंबर एक  पढकर मेरी घरवाली तक ने वोट नहीं दिया और बाकी लोगों ने यह सोचकर वोट नहीं दिए कि जो अपनी  घरवाली तक का वोट नहीं ले सकता उसे हम वोट क्यों दें?“,
   अंकल जी,यहां तक भी वह बेचारा मुझे माफ करने को तैयार है लेकिन मुश्किल  यह है कि उसका बसा बसाया परिवार उजडने वाला है क्योंकि उसकी घरवाली चार दिन से यही पूछ रही है,”राम औतार एक वोट तो मान लिया तूने डाला होगा,लेकिन बताता क्यों नहीं कि दूसरा वोट कौन चुडैल डाल गई.?“
   अंकल जी, अब आप सिर्फ इतना बता दें कि अगली बार किसी का  घोषणा-पत्र बनाने बैठूं तो कौन सी गलतियां न करूं.?
   वैसे कितना अच्छा रहे, अगर आप ही एक नमूना बनाकर भेज दें. आपका यह बच्चा और पिटने से बच जाएगा.
                                                                                              आपका अपना बच्चा
                                                                                              मन का सच्चा
                                                                                            अकल का कच्चा
                                                                                                   -प्रदीप नील

सोमवार, 3 अक्टूबर 2011

1000 रूपए का इनाम लोगे?


आदरणीय अन्ना अंकल ,
     कल अखबार में फोटो छपा हुआ था जिसमें एक लाल बंदर हैट लगाए, काले घोडे पर बैठा मजे से गाजर खा रहा था.इस फोटो का शीर्षक  बताने वाले को 1000 रू का इनाम देने की बात भी लिखी गई थी.
   अंकल जी, जिस देश  में मात्र 50 रू के लिए आदमी को छुरा घोंप दिया जाता हो,वहां 1000 के लिए कागज़ को छुरा घोंपने वालों की क्या कमी ! मैं भी बिस्तर में लेटा 1000 रू के बारे में सोच रहा था.लेखक जब पैसे के बारे में सोच रहा होता है तो लोग यही अंदाज़ा लगाते हैं कि देश  के हालात पर सोच रहा होगा.
भगत सिंह ने भी यही सोचा,जब उन्होने मेरे सपने में आकर पूछा,“उसी देश  के बारे में सोच रहे हो,जिसे हमने जान देकर आज़ाद करवाया था?“
  अंकल जी,मुझे तो बहुत शर्म  आई. मैंने कहा,“हां सर, देश  के साथ साथ 1000 रू के बारे में भी. अब देखिए न, इस फोटो का शीर्षक  लिख कर पैसे पाना चाहता हूं“
भगत सिंह ने फोटो देखा और हंस कर बोले,“इतना क्या सोच रहे हो?लिख दो भारतीय गधे पर बैठा अंगरेज़“
मैंने दबी ज़ुबान से उनकी भूल सुधारने की कोशिश  की,“ठीक से देखिए,सर.यह घोडा है..“
भगत सिंह ने डपट दिया,“चुप रह ,मूर्ख .हम घोडों ने तो इन बंदरों को सवारी तो बहुत दूर, अपने पुट्ठों तक को हाथ नहीं लगाने दिया.यह सूट बूट पहनकर घोडा दिख ही रहा है,वास्तव में तो यह गधा ही है.“
मैं चौंका,“गधा?“
  भगत सिंह ने कहा,“हां गधा. तुम तो जानते ही हो कि चालाक बंदर किसी न किसी पर तो हमेशा  सवार रहते ही हैं.परन्तु,इन बंदरों के हाथ घोडे नहीं लगे तो इन्होने गधों का मेक अप किया,उन्हे हिनहिनाना सिखाया और सवारी करने लगे.गधे खुश  कि वे घोडे हो गए,बंदर खुश  कि उन पर गधों की सवारी का लांछन नहीं लगा“
   मैंने पूछा,“सर आप इनको पहचान कैसे लेते हो?“
 भगत सिंह बोले,“छेड कर देख लेना,सीधे दुलत्ती झाडेगा,और साथ ही अपनी खुद की भाषा  पर भी उतर आएगा.“
  मैंने पूछा,“सर,बंदरों को ढोने में गधों को क्या मज़ा आता है?“
  भगत सिंह बोले,“यह इन गधों का प्राक्रतिक गुण है. किसी अपने स्तर के आदमी को ढोना पड जाए तो ये गधे बहुत ही विनम्र और दीन यानि गधे ही नज़र आते हैं.लेकिन वही गधा किसी थानेदार का सामान ढो ले तो खुद को थानेदार समझ अकडकर चलने लगता है.“
अंकल जी, सच कहूं तो फोटो की असलियत जानकर अब मेरी 1000 तो क्या एक रूपया पाने की तमन्ना भी नहीं रही.लेकिन भगत सिंह ने जो शीर्षक  बताया है,लिख कर भेजूंगा जरूर.मैं यह भी जानता हूं कि अखबार का संपादक मेरा यह शीर्षक पढ कर मुझे पागल समझेगा.कसूर उसका भी नहीं क्योंकि भगत सिंह संपादक के सपनों में आजकल नहीं आते. उनके सपनों में तो बिल्कुल नहीं जो स्वपन दिखने वाली सुंदरियों के आधे नंगे फोटो छापते रहते हैं और खुश  होते रहते हैं कि नारी को सम्मान दे रहे हैं.
  वैसे अंकल जी,क्या ऐसा नहीं होना चाहिए कि भगत सिंह कम से कम, अध्यापक,नेता और मीडिया वालों के सपनों में तो अवश्य  ही आएं
   आपका क्या ख्याल है?
   आपका अपना बच्चा
   मन का सच्चा      
   अकल का कच्चा
    प्रदीप नील

मंगलवार, 27 सितंबर 2011

सोना ? सरकार का या कुँभकरण का ?

आदरणीय अन्ना अंकल,
हमारी कक्षा में एक लडकी पूछने लगी,“सर,सोने का  विशेषण क्या होता है?“
सर जी ने दो जवान बेटियों की शादी करनी है, 10-10 तोले सोना तो देना ही होगा.इधर सोने का भाव छंलागें मार रहा है. उसी चिंता में खोए हुए होंगे. बोले,“बिटिया,सोने का विशेषण  क्या पूछती हो, आजकल तो इसका भाव पूछो,भाव.“
सर जी जिस अखबार में सोने का भाव देखते हैं,वही अखबार लडकी भी पढती है. उसी अखबार में ब्यूटी-पार्लर के नाम पर देह-व्यापार के विज्ञापन भी छपते हैं,जहां हर चीज़ के रेट भी लिखे रहते हैं. लडकी को बहुत शर्म आई लेकिन इतना ज़रूर बोला,“छिः सर, मुझे नहीं पता था आप टीचर होकर भी इतना गंदा सोचते हैं.“
सर चश्मा  पोंछते हुए बोले,“इसमें टीचर क्या करेगा,बेटा?ठीक है अपने बेटे के समय दहेज़ नहीं लूंगा.लेकिन बेटियों को तो सोना...“
लडकी तुरंत समझ गई. बोली,“सारी सर, अब सोने का विशेषण  बता ही दीजिए.“
सर मुस्कुरा कर बोले,“ सुनहरा“
लडकी बोली,“यह तो मैं भी जानती हूं,सर .मैं उस सोने का नहीं बल्कि कुंभकर्ण वाले सोने का  विशेषण  पूछ रही थी.“
सर फिर उलझ गए.इस सोने का  विशेषण  उन्हे नहीं पता.उन्होने ईमानदारी से स्वीकार भी कर लिया कि नहीं जानते. हां,किसी से पूछ कर बतायेंगे.
लडकी भी जानती है कि टीचर होने का मतलब यह नहीं होता कि उसे सब कुछ आता हो. वह मुस्कुरा कर बोली,“ठीक है,सर जी“
आजकल लोकपाल बिल पर भी यही हो रहा है, अंकल जी. आप सो रहे कुंभकर्ण वाले सोने से चिंतित हैं,जबकि सरकार रोजाना  चढ्ते जा रहे मंहगे सोने से. सरकार को जब आप वाले सोने का  विशेषण  पता चलेगा, आप को बता देगी.लेकिन तब और मंहगे हो चुके सोने का भाव जानकर आप दंग मत रह जाना.
सोना नींद उडाता ही है.वह चाहे दहेज़ वाला हो या कुंभकर्ण वाला
                                                             आपका अपना बच्चा
                                                             मन का सच्चा
                                                             अकल का कच्चा
                                                             - प्रदीप नील


जन लोकपाल बिल और राम ओतार का लोटा

आदरणीय अन्ना अंकल,
लोग बेशक  कहते हों कि आप मराठा हैं,लेकिन मुझे तो आप असली हरियाणवी ही लगते हैं.बता ही देता हूं,क्यों?
हमारे पडौसी राम औतार के यहां चोरी हो गई.तफ्तीश  पर आये थानेदार ने पूछा“क्या क्या चोरी हुआ?“
राम औतार ने कहा”लोटा “
थानेदार का अगला प्रशन आना ही था,“लोटा,और..?“
राम औतार ने उसे बेवकूफ समझ्कर गुस्से से घूरा और बोला,“पहले लोटा तो ढूंढ ला.“
अंकल जी, आप भी राम औतार के लोटे की तरह जनलोकपाल बिल पर ही अटक कर खडे हो गए.
 थानेदार घर आया हुआ था. राम औतार लोटे के चक्कर में ऐसा उलझा कि यह बताना तो भूल ही गया कि उसके यहां से दस तोले सोने की चेन और दो लाख की नकदी भी चोरी हुई है.
अंकल जी, आपके पास तो इतने थानेदार आये  थे,राम लीला मैदान में ! आप चाहते तो कह सकते थे कि लोटा तो खोज ही लाओ लेकिन हमारी संस्क्रिती,सभ्यता जैसी दस तोले की चेन खोजना मत भूल जाना. महाजन के सूद की तरह बढ रही आबादी और इसके कारण फैली 300 तरह की बीमारियां(यहां तक कि भ्रष्टाचार  भी उन्ही में से एक है) के इलाज़ की दस तोले की चेन, अन्ना, अंकल !
अंकल जी,कन्या-भ्रूण  हत्या,दहेज-प्रथा,प्रदूषण , आनर-किलिंग,मिलावटी व नकली चीजों के उत्पादन इत्यादि रोकने की जो दो लाख की नकदी गुम है, आप वो भी गिना सकते थे.लेकिन आप लोटे के इलावा किसी बात को याद ही नहीं कर पाए.
वैसे अंकल जी, राम औतार के यहां से थानेदार चलने लगा तो उसकी पत्नी राम दुलारी ने चेन तथा चोरी की बात भी कानों में से निकाल दी थी. आपके पास भी किरण और अरविंद जैसे समझदार भाई बहन तो थे ही,वे ही गिना देते कि जो समाज की,देश  की जो चेन और नकदी गुम हुई है,वह भी खोज ही लेना.
अंकल जी,एक बार ,सिर्फ एक बार कह देते कि नेताओं पर निगाह तो मैं रख लूंगा,तुम भी घर जाकर खुद पर और अपने परिवार पर निगाह रख लेना.
मैं तो यही दुआ कर रहा हूं कि राम औतार के यहां फिर से चोरी हो जाए और इस बार राम दुलारी नहीं बल्कि,राम औतार खुद चेन तथा नकदी की बात करे. 
                                                                                       आपका अपना बच्चा
                                                                                       मन का सच्चा
                                                                                        अकल का कच्चा
                                                                                      - प्रदीप नील

स्तन दो ,बच्चे तीन

 आदरणीय अन्ना अंकल,
देश  के नेताओं को भी कहना कि ज़रा  सोच कर बोला करें.
   परसों ही एक नेता ने बोल दिया कि अपने देश  की आबादी बहुत तेज रफ्तार से बढ रही है और इसे यूं समझो कि हर साल एक आस्ट्रेलिया भारत में आ जुडता है.
   अंकल जी, आबादी की रफ्तार वाली बात पर तो किसी ने ध्यान नहीं दिया ,लेकिन आस्ट्रेलिया आने की खबर जंगल की आग की तरह फैल गई. राम औतार तब से शहर की गलियां छान रहा है कि आस्ट्रेलिया आया है तो गोरी मेमें भी आई होंगी.सारा दिन गालियां देने वाली काली-कलूटी राम दुलारी को तलाक देकर अंगरेज़ी में लव यू,लव यू करने वाली किसी मेम से ही ब्याह करा लूं.
अंकल जी,तब से मैं भी सोच रहा हूं कि आस्ट्रेलिया आया है तो कम भीड वाली बसें,साफ -सुथरे स्कूल,सड़क पर न थूकने वाले सभ्य और शिक्षित  बच्चे भी आये होंगे.साथ में गरीबी दूर करने को डालर. अब तो मेरा बचपन ही संवर जाएगा.                                                                                                                                                 अंकल जी, आस्ट्रेलिया यहां आए दो दिन हो गए लेकिन,देश की तस्वीर तो पहले से भी बदतर दिख रही है.चारों तरफ भीड ही भीड,यहां तक कि शहर के पेशाब घरों तक पर भी लाईन. और वह भी तब जब कुछ बहादुर लोग वहां भी उकडू हो जाते हैं,जहां लिखा होता है,”गधे के पूत,यहां मत ...“
   यही तो गलत बात की,नेता ने. अरे कह देते कि हर साल तो दूर आस्ट्रेलिया एक बार भी भारत नहीं आया और न ही कभी आयेगा.नेता जी को कहना चाहिए था,“ सावधान, दक्षिणी अफ्रीका या ब्राज़ील आ रहा है.और वह इसलिए आ रहा है कि वहां ज़्यादा आबादी के कारण खाने को नहीं मिल रहा.“
   वैसे, अंकल जी, अपने देश  की आबादी बढने की रफ्तार एक दिन आपके मुंह से भी कहला ही देगी कि देश  की बदहाली की ज़िम्मेवार वही नालायक औरत है जो पहले एक सैंकिंड में एक बच्चा दिया करती, अब दो देने लगी है.और थोड़े ही दिनों में तीन  भी देने लगेगी 
परमात्मा ने हर माता को स्तन भी दो ही दिए हैं.दो बच्चों को तो वह दूध पिला देगी लेकिन जब तीसरा आयेगा और उसे दूध नहीं मिलेगा तो वह इसके लिए कोई भ्रष्ट  तरीका ही खोजेगा.
अंकल जी,बच्चा बडा होकर भ्रष्टाचार  सीखता है तभी देश  का यह हाल है.क्या होगा अगर वह पैदा होते ही सीख लेगा. 
मां के दूध से शुरू हुआ भ्रष्टाचार कहां तक जाएगा,इतना तो आप भी जानते हैं. तभी तो कहता हूं कि अपने देश  के नेताओं को भी कहना कि जरा  सोच कर बोला करें.
                                                                आपका अपना बच्चा
                                                                मन का सच्चा
                                                                अकल का कच्चा
                                                                 - प्रदीप नील